ऑनलाइन जिंदगी…

ऑनलाइन जिंदगी…

ये जो आज भागमभाग भरी डिजिटल ई-मेल, लिंक्डइन, ऑनलाइन शॉपिंग, ग्रॉसरी, मार्केटिंग, वाली जिन्दगी गुज़र रही है ना जो सुखद और सुफल लगती है वास्तव में इसने इंसान को चहुँ ओर से जकड़ लिया है। इसके प्रारम्भिक प्रयास के पीछे सपना तो इसे सफल और सुलभ बनाने का ही रहा होगा। सभी प्रकार के अविष्कार व नवोन्मेष हमारे भले के लिए हुए हैं। इनके ज़रिये हमने प्रयोजन और प्रतिस्पर्धा के साथ बहुत से नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं और आगे भी करते रहंगे। निःसंदेह ही डिजिटल होना एक अच्छा कदम होने के साथ साथ एक सुदृढ़ राष्ट्र निर्माण में भी सहायक है। इसके लाभ पर प्रश्न करना कदाचित गलत होगा। परन्तु इसके लाभ के साथ इसके कुछ प्रतिकूल प्रभाव को जान लेना भी आवश्यक है।

अपने विचार को इसीलिए एक संकुचित विषय की ओर अग्रसर करते हुए सबसे पहले चलते हैं उस टेलीफोन पर जिसने एक नये युग को प्रारंभ किया। उस ‘टेलीफोन’ के समय से आज हम ‘आईफोन’ व ‘एंड्रॉयड फ़ोन’ पर आ पहुँचे हैं। ‘मोबाइल’ के शाब्दिक अर्थ पर जाएं तो मिलता है ‘ऐसी वस्तु जो लाने ले जाने में सुगम हो’ पर यहाँ तो लगता है तदभव का भी तदभव रूप बदल गया है। इस ‘चलते-फ़िरते यंत्र’ मोबाइल का प्रयोग इतना सफल और सरल रहा है कि जहाँ गाँवोँ में सालों से सड़कें ना पहुँची वहाँ जेबों में मोबाइल कुछ सालों में पहुँच गए। तो देखो ना देश तरक़्क़ी तो कर ही रहा है।

अगर मोबाइल और इंटरनेट ना हो तो लोग अपने आप को ‘सेफ एंड सिक्योर’ फील नहीं करते। कहीं कहीं तो ये हालत हो चुकी है कि व्यक्ति इसके बिना अपंग सा प्रतीत होने लगा है। बच्चे हो या बुजुर्ग कोई भी इसके प्रभाव से बच नहीं पाया है। छोटे बच्चे चलना बाद में सीखते हैं मोबाइल चलना पहले, स्कूल जाते बच्चों का होमवर्क मोबाइल के बिना होता ही कहाँ है। टीनएजर्स की तो जान ही मोबाइल में बसती है। ऊपर से इंटरनेट का सस्ता होकर आम लोगों की पहुँच में आ जाने से तो ऐसा तहलका मचा हुआ है कि देश विदेश कोई भी इसके कोप-प्रकोप से बच नहीं पाया है। इसने भी अपने यहाँ चाल 2जी से 4जी कर ली है और 5जी की तैयारी में है। इस इंटरनेट का सहयोग अवर्णनीय है क्योंकि इसके द्वारा ना जाने कितने ही काज सँवारे जा रहे हैं। लेकिन हर चीज़ की अति भी बुरी इसी तरह का कुछ हाल देखने को मिल रहा है इस डिजिटल दुनिया के सहारे।

डिजिटल मीडिया के अंतर्गत एक और मीडिया जो पूरी तरह ‘सोशल’ हो अपनी छाप छोड़ चुकी है वह ‘सोशल मीडिया’ है। ‘सोशल मीडिया’ की तरफ रुख़ किया जाए तो कहना गलत नहीं होगा कि सम्पूर्ण मोबाइल का आधार ही सोशल मीडिया रह गया है। परन्तु कहते हैं नाना नाचण आती ना देखण की भीड़, रहता सब घर नूँ ना पड़ती नीड़’ अब जो कुछ बाज़ार में आया है तो चाहत तो सबको लगती है उसे पाने की और फिर चाहे बाद में वह दुखदायी क्यों ना बन जाए। इसकी उपयोगिता के क्रम को आगे बढ़ाते हुए हम जिस ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाह रहे हैं वह सोचनीय प्रकरण यह है कि आप और हम कितने इसे सुनियोजित रूप से इसका प्रयोग कर इसके साथ सही दिशा में बढ़ रहें हैं? इस आडम्बर भरी दुनिया में सबकुछ सिर्फ दिखावे का ही रह गया सा लगता है। हमें तो ये बताते हुए ‘आँख एक नहीं और कजरौटा दस दस’ ये कहावत याद आ गई सही भी है आडम्बर इस तरह रचे जाते हैं कि देखते ही लोग भ्रमित हो जाते हैं और जिसके जाल में जो फँसी, वो चिड़िया उसी कि।

आजकल लोग ‘मोमेंट’ जीने के बजाए उसे सिर्फ ‘कैप्चर’ करते हैं जिससे अपनी चमक पर चार चाँद लगा सके। ये ऍप्स जैसे फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर, टिकटोक आदि ऍप्स पर आकर जिंदगी थम सी गयी है। आदमी खुद एक्टिव हो ना हो पर अनेक ऍप्स पर एक्टिव जरूर मिलेगा। यहाँ पर स्टेटस अपलोड करना ही जैसे एक मात्र उद्देश्य रह गया हो। कई डेटिंग ऍप्स के साथ शादी के बिचौलियों की जगह ‘शादी ऍप्स’ ने ले ली है, और ना जाने कितनी ही ऍप्स हैं जिन पर हम दिन में कितनी ही बार अपनी उंगलियाँ दौड़ाते होंगे और आप ख़ुद ही अनुमान लगा लीजिये की कौन कितनी बार कुछ काम आने वाली चीज़े देखते होंगे! इसके साथ हर एक चीज़ जो ऑनलाइन होती जा रही है क्या वो सही है? क्या इसमें आपको भटकाव के रास्ते नज़र नहीं आते हैं? जो नई पीढ़ी को ‘कूल’ और ‘मॉडर्न’ बनाने की ओर अग्रसर करते हुए कभी कभी गलत राह पर पहुँचा देता है।

इसके दूसरे पहलू को देखते हुए आप लोगों ने भी पाया होगा कि कितने ही रिश्ते इस ‘फ़ोन’ और ‘पर्सनल स्पेस’ के बीच आकर बर्बाद हो गए हैं। बुद्धि विवेक इस्तेमाल किए बिना ही ‘स्क्रीन-शॉट’ भर भरोसा ज्यादा और ‘ऑनलाइन’ होने पर शक के बीज बोये जाते हैं। आप कितने सही हैं इसका फ़ैसला सिर्फ आपकी प्रोफाइल देख कर किया जाता है । फेक प्रोफाइल द्वारा घरों को बर्बाद किया जाता है। कुछ असमझ अधज्ञानी लोग कहाँ क्या अपलोड कर रहे हैं उन्हें खबर तक नहीं। बस मौज़ में सब किए जा रहे हैं। इस ‘अपलोड-डाऊनलोड’ के बीच में ना जानें कितनी ही जिंदगियां उजड़ चुकी हैं किसी को हिसाब तक नहीं और इस बहती गंगा में हाथ सबने धोए होते हैं पर बताता कौन है।

इस तरह ये ‘ऑनलाइन’ का मोह ना जाने हमसे कब, कहाँ, कैसे, क्या करवा दे ये स्वयं हम भी नहीं जानते। ये ऑनलाइन जिंदगी इस कदर हावी हो चुकी है कि शराबी एक बार को शराब त्याग भी दे पर इस ‘इंटरनेट’ या ‘फोन’ की लत नहीं छोड़ सकता कोई। ये लत कुछ लाइलाज बीमारी की तरह लगती है जो कि ‘आ गई है जान के साथ और जाएगी जनाज़े के साथ’। इसलिए हम तो बहुत ही मार्मिक टॉपिक के साथ उपरोक्त बातों पर विचार करने व स्वयं परीक्षण के साथ उसे सही गलत के तराजू में तोल कर इससे उपयुक्त लाभ प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं। आशा है आप सभी इससे सहमत होंगे।

 

डिजिटल बनिये, डिजि-टेल नहीं…!!

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Sunanda Jadaun

A Literature lover, Teacher, Researcher, Writer, Poet and Artist are the words that describe me the best. I love to share my thoughts and connect people with my Merakiness.

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