ख्वाहिश…

ख्वाहिश…

जतन तो बहुत करते हैं ख्वाहिशों को हम लोग हक़ीक़त में बदलने की, पर किसी मर्तबा राह बदल जाती है तो कहीं ख्वाहिश का गला घोटना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि बिन इसके जिया नहीं जाता हो पर कमबख्त ये नन्हे से दिल को ज़ार ज़ार कर जाती है, और ज़रा औकात तो देखिए हमारी, एक ख्वाहिश को पीछे छोड़ कर हम भी आवारा आशिक से दूसरी ख्वाहिश के सपने संजोने लगते हैं, कहते हैं न के सपने देखेंगे नहीं तो पूरे कैसे होंगे पर इनको देखते देखते हम हक़ीक़त छोड़ कर सपनो में जीने लग जाते हैं और वही से हर दर्द का मसला शुरू हो जाता है।

देखो कैसी अजीब अजीब ख्वाहिशें हैं सबकी; सपने की ख्वाहिश हक़ीक़त में आने की, हक़ीक़त की ख्वाहिश जमीं पे लाने की, जमीं की ख्वाहिश आसमां की और आसमां की ख्वाहिश उड़ने की, कहो ये भी कोई ख्वाहिश हुई भला! अब आदमी से भी मिल लेते हैं इस ‘आदमी’ को नाम की है ख्वाहिश, नाम को है मंजिल की, मंजिल को दुनिया की और दुनियां की ख्वाहिश राज की। अब क्या कहें आदमी का मिज़ाज ही कुछ ऐसा है। अब ज़रा बात करते हैं इनकी – चाँद को ख्वाहिश दिन की और सूरज को तपन की, पानी को प्यास की ख्वाहिश तो आग को ज्वाला की, हवा को सुकून की तो वहीं शरीर को आत्मा की, आत्मा को ब्रह्म की और बह्म को है मोक्ष की ख्वाहिश, शब्द को निशब्द की और मौन को शांति की, आँसूओं को छलकने की तो जाम को बहकने की ख्वाहिश। कहिये अब कुछ कमी है यहाँ, ख़ैर, ये तो कुछ एक वो ख्वाहिशें हैं जो साक्षात हैं, ख्वाहिश जो लोगों की हैं यहाँ; वो अवर्णनीय है उनकी जो ख्वाहिश बता दी तो माफ़ी को भी हाथ जोड़कर माफी मांगनी पड़ जाएगी। पर इन सब में, सबसे हसीन ख्वाहिश बताएँ, यहाँ हाल ये है जनाब की ख्वाहिशों को भी अब तो ख्वाहिश सी है उनको ख्वाहिशों में पाने की, उनका हमारी दुनियां में आने के बाद।

ये ख्वाहिशें भी न कमाल करती हैं, कभी जी तोड़ती हैं तो कभी मचला देती हैं, कभी जी टूटता है तो कभी मरहम लगाती हैं, कभी जी चुराती हैं तो कहीं बेखौफ नज़र आती हैं, देखिये न कैसे ये नज़रों में सब बयाँ कर जाती हैं। किसी के प्रेम उड़ेलने में प्रेम पाने की ख्वाहिश, तो कहीं दर्द में सुकून पाने की ख्वाहिश, सिपाही को शहीदी की ख्वाहिश तो घरवालों को वापसी की, अपनी गुड़िया में देखती वो अपनी ममता की ख्वाहिश, स्लेट पे उकेरी औरत में दिखती माँ की ख्वाहिश, तो काँधे पे सवार को देख पिता की पीठ की ख्वाहिश, कहीं राखी देख भाई की तो विदाई देख बहन की ख्वाहिश, गले मिलते देख दोस्त की तो हाथ थामे बैठे महबूब की ख्वाहिश। हाय! ये ख्वाहिशें ही हैं या दौलत है दुनियां की? अब आप ही फरमाइयेगा !

बड़ी ही मासूम सी होती हैं ये ख्वाहिशें ज्यादा जकड़ने पर फूट भी पड़ती हैं, कभी असभ्य, कभी अलगाव, कहीं आतंकवाद, तो कहीं हवस बनकर। समझे कुछ ज़नाब, तो फिर पाक सी इन ख्वाहिशों का गला घोंट कर इन्हें पाक*स्तान न बनाइये। (कृपया मज़ाक को मुद्दा और मुद्दे को मज़ाक न बनाएं)

“तमाम जो ख्वाहिशें हैं न इनको ज़ाया न कीजिए कभी जो आ जाए दिल में तो दबाया न कीजिये।”

Sunanda Jadaun

A Literature lover, Teacher, Researcher, Writer, Poet and Artist are the words that describe me the best. I love to share my thoughts and connect people with my Merakiness.

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