रुबरु…

रुबरु…

तुम्हारी जुबाँ से अगर मैं सुनूँ,
कुछ अनकहे शब्द,
जो निकलने को आतुर दिखते हैं,
लिए कुछ स्वर्णिम स्पंदन,
जो बनेंगें आधार और रचेंगे नए आयाम,
लिए उनको मैं सपने फिर बुनूँ,
सपनों को हक़ीक़त में जियूँ,
फिर यूँ हक़ीक़त में सपनों को लाकर तुम,


निभाना साथ, ना छोड़ जाना तुम,
ये दिल काँच सा, ना तोड़ जाना तुम,
इन शब्दों को जुंबा से सुनने से पहले,
कुछ और ही जो आँखों से दिखला दिए तुम,
जो कहना था वो कहा नहीं,
जो सुनना था वो सुना नहीं,
हुए कुछ इस तरह अनजान तुम,
आईना दिखा कर अंजाम से जो चल दिये तुम,
जाना ही पड़ा तो फिर सुन लो ये भी तुम,
अभी तक तुम से जो साज थे हम,
रूबरू हुए आज हम ही से हम, तो जाना


नासाज़ हूँ, निराधार नहीं,
निमृत हूँ, निकृत नहीं,
हो जाएँगे एक दिन साकार हम भी,
निसर्ग हूँ, नश्वर नहीं…!!

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Sunanda Jadaun

A Literature lover, Teacher, Researcher, Writer, Poet and Artist are the words that describe me the best. I love to share my thoughts and connect people with my Merakiness.

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