वक़्त की बैंक

वक़्त की बैंक

निग़ाहों के दरवाजे से घुसे हम, चले थे बैंक लूटने। के ज्यों ही दिल के दरवाजे में दस्तक दिए तो देखा बहुत भीड़ है यहाँ, मसला ये नहीं की भीड़ यहाँ इत्ती कैसे है, मसला इत्ता सा है कि क्या सभी लूटेरे हैं?

हम अपनी निगाहें चौकन्नी रख गर्दन झुकाए हुए बस नजारा देख ही रहे थे कि तभी एक बड़े से कद काठी वाले खूबसूरत से ‘लम्हे’ ने हमे घूरते हुए इशारो में पूछ लिया के आप यहाँ कैसे? जवाब तो हम तब देते जब ये जानते कि ये जनाब हैं कौन। तो भौहें चढ़ाते हुए हम उनकी तरफ देख के जवाब ढूंढने की कोशिश कर ही रहे थे के अचानक हमारी नज़र बैंक के लॉकर रूम के उन लॉकर्स पर पड़ी जिनकी आज शायद चाबियाँ भी न मिले। लालसा वस हम बढ़ते चले गए।

और फिर हम भी कहाँ कम थे हमारी भी ज़िद थी कि चाहे जो हो अब जब दस्तक दे ही दी तो बिना कुछ लूटे तो हम यहाँ से नहीं ही जायेंगे। हम भी लगे हमारी चाबियों को उन लॉकर्स में लगाने । अब दिक्कत ये नहीं के लॉकर खुल क्यूँ नहीं रहे दिक्कत ये थी कि हमारी चाबियाँ कम थी और लॉकर्स ज्यादा । एक चाबी तो ऐसी लगी के मानो बाहर ही नहीं निकलना चाह रही हो इसी जद्दोजहद में लगे हम कुछ कर पाते उससे पहले एक अनाउंसमेंट सुनाई दिया “बैंक को किसी गिरोह द्वारा चारों तरफ से घेर लिया गया है।”

हम जो ख़ुदको तोपखां समझ रहे थे वो असल मे हमारी भूल थी क्योंकि हम थे अकेले और ऊपर से ये भूल गए कि लूटने को दुनिया भी बैठी है।

पर अब क्या लूटेरे आज खुद कब्ज़े में है वो भी ऐसी जगह जहाँ रहने की आज़ादी तो है पर बाहर निकलने की इज़ाज़त नहीं। कुछ समझ आने से पहले ये समझ आया के लूटने की ख्वाहिश में हम महल की चढ़ाई तो कर बैठे पर चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता पता किए बिना।

अब हमारी रिहाई भी कौन करे भला, किसके पास जाके गुहार लगाएं क्योंकि कमबख्त दरवाज़े और दीवारों के अलावा हमारे सच का साक्षी कोई नहीं यहाँ। खुद दरवाज़े खुल नहीं सकते, बोल नहीँ सकते, ये जानते हुए भी के हम कुछ लूट ही नहीँ पाये बैंक हमें रिहा करे भी तो कैसे!

गिरोह, जिसने घेराबन्दी की वो भी ऐसा, की अंदर आने की कोशिश किए बिना ही अंदर का सब कुछ लूटना चाहे। जो सहमे हुए ‘पल’ से डर के बाहर हिम्मत कर देखा तो पाया उस गिरोह का सेनापति और कोई नहीं ‘वक़्त’ था और उससे भी बड़ी बात के उसके साथ उनके आदमियों में ही शुमार हमारे ही कुछ जाने पहचाने चेहरे जो ‘वक़्त’ का साथ दे रहे थे फिर चाहे बेमन ही सही। देख के नज़ारा धक्का तो लगा पर सोचा रिहाई तो मिलनी भी नहीं तो क्यूँ न पूछने की गुस्ताखी भी कर ही ली जाए।

जैसे ही पूछा हमने की ये घेराबंदी हमारे लिए है या सभी के लिए और ऐसा क्यूँ? तो जवाब भी उसी तेज़ी से आया जिसकी उम्मीद थी “लूटने की जल्दी दोनो को थी तुम्हें भी हमें भी” और जब अपने ही लोगों से जवाब चाहा तो जैसे लाऊड स्पीकर पर बोला हो, सुनाई पड़ा-

“वक़्त है ये, सबके साथ चले न चले, पर सबको इसके साथ चलना ही पड़ता है।”

अब भला हम भी क्या करते बिना कुछ बोले, बिना कुछ मांगे, मुँह मस्कोरते हुए अपनी चाबियों में से एक चाबी जो फँस गयी थी उसे भी वहीं मीठे से ‘यादों’ के उस लॉकर में और अच्छे से जकड़ा आये ये सोच कर, के तमाम ये जो चाबियाँ बेजान सी लटकी पड़ी हैं यहाँ-

ये भी वक़्त के मारे, इश्क की बैंक में आये होंगे हमारी ही तरह मोहब्बत का धन लूटने ।

वक़्त एक बैंक…

 

Sunanda Jadaun

A Literature lover, Teacher, Researcher, Writer, Poet and Artist are the words that describe me the best. I love to share my thoughts and connect people with my Merakiness.

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