भौतिकवाद- सत्य या भ्रम

भौतिकवाद- सत्य या भ्रम

‘भौतिकवाद’ ये शब्द कहने को तो अपने आप में ही बड़ा सार्थक है, जिसकी परिभाषा तो कहती है कि पँच-भूतों से मिलकर बने इस संसार को ही सत्य और वास्तविक मानना, परन्तु इस शब्द के भेद में कोई उलझ गया तो इससे बाहर आना भी एक भूल-भूलैया से बाहर आने जैसा है, जहाँ आदमी एक रास्ते से जैसे तैसे निकले भी तो दूसरे में अनायास ही कदम बढ़ा बैठता है।

अब हमारे समझ ये नहीं आता कि भौतिकवाद को पढा और समझा कैसे जाए। कभी ये चार्वाक का ‘लोकायत’ अर्थात ‘प्रत्यक्ष ही प्रमाण’ लगता है तो कभी ये कार्ल मार्क्स के ‘द्वंदात्मक भौतिकवाद’ को भी स्पष्ट करता है। अतः इसे समझने के लिए जीव, पदार्थ, आत्मा, जड़, चेतना, मन, बुद्धि, दिक-काल के साथ-साथ भौतिकवाद के रूप-प्रारूपों आदि को भी जानना होगा इसीलिए इसे यही विश्राम देते हुए ‘दर्शन-शास्त्र’ पाठकों के लिए ही छोड़ देते हैं, और हम चलते हैं भौतिकवाद की भौतिकता को अपने ही अनुरूप समझने।

भौतिकवादी होना गलत नहीं लेकिन भौतिकवाद के असली स्वरूप को छोड़कर हम उसका वर्तमान युग में मतलब ‘ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत्’ अर्थात उधार लेकर घी पीने वाली अवधारणा को मानने लगे हैं, जो मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन जान पड़ता है। इन खाओ पियो और मौज करने वाले भौतिकवादी लोगो को अपने स्वार्थ की ही चिंता होती है इसके अलावा वो निःस्वार्थ भाव से कोई भी काम को नहीं करते ना ही करना चाहते, उनको लगता है जीवन एक है और इसे अच्छे से खुद के लिए जिया जाए और इसी वेग से चलने के कारण वे अन्तर्मन की आवाज़ और ईश्वरीय प्रताप दोनों से दूर जाने लगते हैं और इस भौतिकवाद में उलझते हुए वे इतने आसक्त हो जाते हैं कि इसे ‘भोगवाद’ कहना गलत नहीं होगा।

भोगवाद के असीम चकाचौंध में इंसान त्वरित, उग्र, अशांत, असन्तुष्ट, अतृप्त, व्यग्र एवं व्यस्त होने के साथ साथ भविष्य सुरक्षित करने में चिंतित रहता है, परन्तु वह ये भूल जाता है कि अंतर्मन की चेतना ही आपको इन सब से मुक्ति दिला कर मन, चित को शांति एवं सुख प्रदान कर सकता है। मनुष्य आदि-अनन्त के बीच की कड़ी है लेकिन वो बीच के रास्ते को ही परम् सत्य मान कर उसी में झूलता रहता है। आदि को वो जानना नहीं चाहता और अनन्त तक वह पहुंच नहीं पाता। इस आदि अनन्त को समझने का रास्ता भी हमें दूसरा ही तय करना पड़ेगा।

हमारा तो इतना ही कहना है कि इस भौतिक जीवन को भोगी जीवन ना बना कर इसके वास्तविक सत्य को ध्यान रखकर जीवन को व्यतीत करना ही मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिए। भोगीवादी प्रदर्शन पूर्ण, स्पर्धा पूर्ण, अधिकाधिक होड़, भोग वैभव भरा कृत्रिम वातावरण में ही सम्पूर्ण जीवन निकाल देता है और आत्मा परमात्मा का ज्ञान होने पर भी उसपे विश्वास नहीं कर पाता। सभी जगह से निराधार होने पर भी उस परम शक्ति पर विश्वास होना आवश्यक है क्योंकि वही विश्वाश आपकी जिंदगी की नाव को पार लगाता है। इस प्रतिस्पर्धात्मक जीवन में उस परम शक्ति को याद करने मात्र से व्यक्ति सही गलत में अंतर करके सत्मार्ग पर चलते हुए धर्मपूर्वक निर्वाहन कर सकता है और ऐसा करना ही कलयुग में हमारे अनुसार पर्याप्त है।

अतः ये भौतिकवाद एवं भोगवाद एक भ्रम मात्र है जिसकी वास्तविकता आध्यात्म मार्ग से होकर ही गुजरती है। आध्यात्म मार्ग का ज्ञान ही मनुष्य को सदमार्ग की ओर ले जा सकता है। वरना कूपमण्डूक की भांति हम सम्पूर्ण जीवन एक भ्रम में निकाल जाएंगे जहां सत्य का प्रकाश पहुँचना असंभव है। भ्रम में रहकर ब्रह्म का ज्ञान नहीं हो सकता।

 

भौतिक आवश्यकताओं की भी हो पूर्ति,

रहे आध्यात्म ज्ञान तो मिले सर्वसम्मत कीर्ति..!!

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Sunanda Jadaun

A Literature lover, Teacher, Researcher, Writer, Poet and Artist are the words that describe me the best. I love to share my thoughts and connect people with my Merakiness.