रुबरु…

तुम्हारी जुबाँ से अगर मैं सुनूँ,कुछ अनकहे शब्द,जो निकलने को आतुर दिखते हैं,लिए कुछ स्वर्णिम स्पंदन,जो बनेंगें आधार और रचेंगे नए आयाम,लिए उनको मैं सपने फिर बुनूँ,सपनों को हक़ीक़त में…

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खंडहर होते घर

आज आपसे बातें करने का मन है आज ना ज्ञान देंगे ना ही कुछ अपना कहेंगे आज सिर्फ आपकी सुनेंगे, कुछ ऐसा ही सोच कर हम निकले थे घर से…

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एक कटु सत्य

वैसे तो हमें तंग गलियों में जाना पसंद नहीं पर जो आज गुजरे दिमाग की उन गलियों से तो बहुत सी खिड़कियों से निहारते कुछ चेहरे नज़र आये, जिनको देख…

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